October 27, 2021
11 11 11 AM
*ପାଂଥଶାଳା – ଶ୍ରୀ ଅଲେଖ ପ୍ରସାଦ ମହାରଣା*
*କୁମାର ପୂର୍ଣ୍ଣିମା – ଜଗଦୀଶ ଶତପଥୀ*
*ମୁଁ ଶେଫାଳି – ପ୍ରିୟଦର୍ଶିନୀ ମିଶ୍ର*
*ଟିକେ ଖରା ଟିକେ ଛାଇ – ନବ କୁମାର ଦାସ*
*ମଣିଷ ହୁଅନ୍ତି ବଣ୍ଟା-ସୀମାଞ୍ଚଳ ପଣ୍ଡା*
*ଲକ୍ଷ୍ୟ ପଥ – ବନଲତା ଜାଲି*
*ମୁଁ ଶିଶୁଟିଏ କହୁଛି-କଳ୍ପନା ରାୟ*
*ମାଆ ସମଲେଶ୍ଵରୀ-ଜାନକୀ ମହାନ୍ତ*
*ବଳୁଆ କିଏ – ସୀମାଞ୍ଚଳ ପଣ୍ଡା*
*ଦୁସ୍ଥ ସମାଜ – ସୀମାଞ୍ଚଳ ପଣ୍ଡା*
*ଫୁଲ ଟିଏ ଦିଅ କରି – ସୀମାଞ୍ଚଳ ପଣ୍ଡା*
*ଆ’ ସାଥୀ ଫେରିଆ – ସୀମାଞ୍ଚଳ ପଣ୍ଡା*
*ଗଣତନ୍ତ୍ର ଆଜି ଯାଇଛି ଫସି-ସୀମାଞ୍ଚଳ ପଣ୍ଡା*
*ଫେରିବ କି ରାମ ରାଜ୍ୟ – ସୀମାଞ୍ଚଳ ପଣ୍ଡା*
*ମାନବିକତା – ସୀମାଞ୍ଚଳ ପଣ୍ଡା*
*ଭାଙ୍ଗି ଦିଅନା ମୋ ହୃଦୟ – ସୀମାଞ୍ଚଳ ପଣ୍ଡା*
*ପାରିବାରିକ କଳହ – ସୀମାଞ୍ଚଳ ପଣ୍ଡା*
*LOST IN SENSE- Dr.Prasana Kumar Dalai*
*MADE FOR EACH OTHER -Dr.Prasana Kumar Dalai*
*The current of time –  Alekha Prasad Moharana*
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*ପାଂଥଶାଳା – ଶ୍ରୀ ଅଲେଖ ପ୍ରସାଦ ମହାରଣା* *କୁମାର ପୂର୍ଣ୍ଣିମା – ଜଗଦୀଶ ଶତପଥୀ* *ମୁଁ ଶେଫାଳି – ପ୍ରିୟଦର୍ଶିନୀ ମିଶ୍ର* *ଟିକେ ଖରା ଟିକେ ଛାଇ – ନବ କୁମାର ଦାସ* *ମଣିଷ ହୁଅନ୍ତି ବଣ୍ଟା-ସୀମାଞ୍ଚଳ ପଣ୍ଡା* *ଲକ୍ଷ୍ୟ ପଥ – ବନଲତା ଜାଲି* *ମୁଁ ଶିଶୁଟିଏ କହୁଛି-କଳ୍ପନା ରାୟ* *ମାଆ ସମଲେଶ୍ଵରୀ-ଜାନକୀ ମହାନ୍ତ* *ବଳୁଆ କିଏ – ସୀମାଞ୍ଚଳ ପଣ୍ଡା* *ଦୁସ୍ଥ ସମାଜ – ସୀମାଞ୍ଚଳ ପଣ୍ଡା* *ଫୁଲ ଟିଏ ଦିଅ କରି – ସୀମାଞ୍ଚଳ ପଣ୍ଡା* *ଆ’ ସାଥୀ ଫେରିଆ – ସୀମାଞ୍ଚଳ ପଣ୍ଡା* *ଗଣତନ୍ତ୍ର ଆଜି ଯାଇଛି ଫସି-ସୀମାଞ୍ଚଳ ପଣ୍ଡା* *ଫେରିବ କି ରାମ ରାଜ୍ୟ – ସୀମାଞ୍ଚଳ ପଣ୍ଡା* *ମାନବିକତା – ସୀମାଞ୍ଚଳ ପଣ୍ଡା* *ଭାଙ୍ଗି ଦିଅନା ମୋ ହୃଦୟ – ସୀମାଞ୍ଚଳ ପଣ୍ଡା* *ପାରିବାରିକ କଳହ – ସୀମାଞ୍ଚଳ ପଣ୍ଡା* *LOST IN SENSE- Dr.Prasana Kumar Dalai* *MADE FOR EACH OTHER -Dr.Prasana Kumar Dalai* *The current of time –  Alekha Prasad Moharana*

*सवाल– बालिका सेनगुप्त*

**सवाल **
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रात दिन के रंग.. धूप और परछाई की
पहने परिधान.. मुहब्बत और रूसवाई की..!
तन्हा कतरनें धड़कनों के चंद
दिल के किसी कोमल से कोने में दुबके..!
सहमे ओढ़े लिहाफ़… ठिठुरते…!
ठंडक और गर्माहट की प्रतिबिंबों को…
करते प्रतिबिंबित और प्रतिध्वनित
रात की आधी सी… आधी रात को..!
जेठ की भरी दोपहरी वाली दिन के..
उजालों के साथ…!
गांव के एक टूटे से फूस के झोपड़े पर
सौ साल की पुरानी चुल्हे,.. पर चढी. ..
उस दूध चावल के खीर पर उफनते…
उफान पर ख्वाबों के चंद बुलबुले…
मांगते उधार उस चुल्हे की आंखों से आंसू
बहा ले जाते उन धुएं की पतंगों से
जो जन्मदिन की खीर को एक पूर्णिमा की पूरी रात
चांद को परोस कर.. चुल्हे की आंच को
अगले कुछ घंटों कई दिनों के लिए
शांत होते देखने को थी मजबूर…
बस अगली सुबह खीर पर की मोटी मलाई और छाली
सोंधी इलायची की बारीक पीसी मजबूरियां….
और चूल्हे की लकड़ियों का रूठना…न था जाली..
अंतड़ियों का एंठना… सवाल पेट का…जवाब चूल्हे का…
सिंकती मोटी खुरदरी रोटी….ताजी या बासी…
खीर का फटना… स्वाद या भूख…
जीभ दिमाग या दौड़ते चूहों की शांति..
सवाल समाज से….. इंतजार और इंतजाम में
गरीब या गरीबी….! आह…!
था न…फर्क..?… रात… दिन का…!

All rights reserved with Balika Sengupta

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