और चलो साथ ढूंढें वो दीया
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ज्ञान के शब्दों के दीपक जलाना
दिलों को भाईचारे के मोम सा गलाना
खुद भी जीना औरों को भी जीलाना
बीती कटु अनुभवों के पटाखे तुम जलाना
सबके उम्मीदों के दीपक जला सको
ऐसे दीपक होकर तुम जलना
गिले शिकवे दूर कर मिलना मिलाना
मीठी बोली की मिठाई खिलाकर खिलना खिलाना
जीवन की हर निराशा अंधियारे तुम लीलना
रिश्तों में पड़े दरारों के पैबदों को सींच कर सीलना
बंधु अबकी दिवाली तुम ऐसे मनाना..
ऐसी दिवाली तुम हर रोज मनाना….
और चलो साथ ढूंढें वो दीया..!
हाथ पकड़ उड़ चलें उजालों के देश…
पहन आए वहां से उजालों भरा वेष..
लाएं फरिश्तों का संदेश,
दूर करे अंधियारा, कलह और कलेष
कभी देखना गौर से कि तपस्वी सा जलता वो दीया
तप में मगन, ध्यान की अगन, जलने की लगन
अंधेरों के पर्वत की चोटी पर,
फहराया उसने उजियारे का झंडा
शूल चुभोती हवा हिमपात,
शीलावृषटि न डाल पायी..
उसपर अपनी कुटील दृष्टि,
रचाई उसने उजाले की सृष्टि..
उजाले का नया संसार बुना.
. शांति प्रेम का परिवार चुना
हर दीपक का दर्द सुना.. सुनाया उन्हें अमर संगीत
गीत गाया गुनगुनाया कालातीत…!
हर दीपक से प्यार से मिला.
. गिले शिकवे हुए दूर, काफिला आगे चला
अंधेरा ठीठका, पीछे जा हटा, पछताया, हाथ मला
तो कहो ऐसे ही क्यों न हम जागे भला
तो कहो ऐसे ही क्यों न दीपक सा हम जले भला….!

बालिका सेनगुप्ता

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